Wednesday, June 20, 2007

प्रिय, क्या तुम जानती हो

प्रिय,
मालूम है तुम्हें,प्रेम क्या है,
शायद बहती धारा पर चलने की कोशिश!

प्रिय,
मालूम है तुम्हें,प्रेम क्या है,
शायद अग्निशोलों पर खाली पैर चलने की कोशिश!

प्रिय,
मालूम है तुम्हें,प्रेम आखिर क्या है,
शायद बिना पंख उड़ने की अनुभूति!

प्रिय,
मालूम है तुम्हें,प्यार आखिर है क्या,
शायद कलियों का प्रस्फ़ुटित होना!

प्रिय,
मालूम है तुम्हें,क्या है प्रेम,
शायद फ़ूलों द्वारा अपने परागकणों का दान!

प्रिय,
मालूम है तुम्हें,प्यार क्या है,
शायद कुछ ना पाकर भी सब कुछ पा लेने का सुख!

प्रिय,
मालूम है तुम्हें,प्रेम आखिर है क्या,
शायद सोए हुए बच्चे की सुखद,मासूम मुस्कान!

प्रिय,
मालूम है तुम्हें,प्यार आखिर है क्या,
शायद जीने की एक कोशिश मात्र!

क्या कहती हो तुम प्रिय!!

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LOVE IS GOD - प्रेम ईश्वर है।
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2 comments:

रंजू said...

प्यार है इक एहसास
दिल की धड़कनी को छूता राग
या है पागल वसंती हवा कोई
या है दिल में झिलमिल करती आशा कोई
या प्यार है एक सुविधा से जीने की ललक
जो देती है थके तन और मन को एक मुक्त गगन

:):):):)
बहुत ही सुंदर रचना और दिल को छूते कई सवाल है इस में ...shurkiya ...

मीनाक्षी said...

कुछ ना पाकर भी सब कुछ पा लेने का सुख!
------ यही प्यार है.
सच मे प्रेमाश्रम के सदस्य किसी अलौकिक आनन्द मे डूबे दिखाई देते हैं.... .