Friday, June 15, 2007

दिल के बन्धन


कुछ खो सा गया है
एक जाने से तुम्हारे
अनमना सा हो गया हूं
फ़िर न आने से तुम्हारे

रिक्त प्राय हो गया है
आसक्ति का स्त्रोत जैसे
अश्रू नैनों में भरे है
पीडा से ओतप्रोत जैसे

भूल मुझसे क्या हुई है
बस यही मुझको सालता है
ह्रदय है कि पल पल जाने
भीतर भ्रम कितने पालता है

प्यार क्या है, रूह क्या है
कौन जान पाया है कभी
बन्धनों का दिल के शायद
"प्रेम" नाम रखा है यहां

- मोहिन्दर

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LOVE IS GOD - प्रेम ईश्वर है।
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2 comments:

रंजू said...

बहुत ही सुंदर रचना है ..यह बहुत अच्छी लगी

प्यार क्या है, रूह क्या है
कौन जान पाया है कभी
बन्धनों का दिल के शायद
"प्रेम" नाम रखा है यहां

गिरिराज जोशी said...

बहुत ही खूबसूरत!!!

बधाई मोहिन्दरजी.