Thursday, June 14, 2007

अमर-प्रेम

जब एक प्रेम का धागा जुड़ता है,
दिल का कमल तब ही खिलता है

देखता है खुदा भी आसमान से जमीन पर
जब एक दिल दूसरे से बेपनाहा मोहब्बत करता है

सुलगने लगता है तब धरती का सीना भी
जब कोई आसमान बन के बाहो में पिघलता है

लिखी जाती है तब एक दस्तान-ए -मोहब्बत
तब कही जा कर अमर-प्रेम लोगो के दिलों में उतरता है!!

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LOVE IS GOD - प्रेम ईश्वर है।
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4 comments:

Kavi Kulwant said...

अच्छा है! कवि कुलवंत
kavikulwant.blogpost.com

मोहिन्दर कुमार said...

वाह जी वाह
बहुत खूब लिखा है जी आपने प्रेम के बारे में

जब एक प्रेम का धागा जुड़ता है,
दिल का कमल तब ही खिलता है

मगर मुश्किल तो ये है कि ये दिल मुश्किल से मिलता है

गिरिराज जोशी said...

वाह!

रंजनाजी, सही कहा है आपने -

जब एक प्रेम का धागा जुड़ता है,
दिल का कमल तब ही खिलता है

बहुत खूब!

मीनाक्षी said...

सुलगने लगता है तब धरती का सीना भी
जब कोई आसमान बन के बाहो में पिघलता है

सभी कविताएँ पढ़ीं....

आपने बहुत सुन्दर रूप मे सभी प्रेम करने वालों के भावों को शब्द रूपी फूलों की माला मे पिरो दिया..

बहुत खूब !